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स्वतंत्रता बनाम परंपरा: शिक्षा विभाग के आदेश का विश्लेषण

1. आदेश की पृष्ठभूमि और मुख्य बिंदु

क्रिसमस के ठीक बाद आज 26 दिसंबर को जब स्कूल खुले, तो मुख्य चर्चा जिला शिक्षा अधिकारी के उस परिपत्र (Circular) पर रही, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि स्कूलों में किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध या उसके अभिभावकों की अनुमति के बिना ‘सांता क्लॉज’ या किसी भी धार्मिक प्रतीक की वेशभूषा धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। विभाग का तर्क है कि स्कूल एक साझा मंच हैं जहाँ सभी धर्मों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार का सांस्कृतिक चित्रण अनिवार्य न होकर स्वैच्छिक होना चाहिए।

2. ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ और ‘सहमति’ का मुद्दा

शिक्षा विभाग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता के सम्मान में उठाया गया है। आदेश में निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया गया:

  • अभिभावकों की लिखित सहमति: यदि कोई स्कूल किसी छात्र को सांता क्लॉज या अन्य कोई विशेष वेशभूषा पहनाना चाहता है, तो उसे पहले अभिभावकों से अनुमति लेनी होगी।

  • मजबूरी पर रोक: किसी भी बच्चे को स्कूल की गतिविधि या अंक (Internal marks) का डर दिखाकर ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

  • समावेशी वातावरण: स्कूलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि त्यौहार मनाते समय किसी भी छात्र या परिवार की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे।

3. समाज और बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया

इस आदेश पर जिले में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है:

  • समर्थन में तर्क: कई अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अक्सर निजी स्कूल अपनी ब्रांडिंग या फोटो सेशन के लिए छोटे बच्चों पर विशेष ड्रेस पहनने का दबाव बनाते हैं, जो कई परिवारों की मान्यताओं के विपरीत हो सकता है। यह आदेश बच्चों के मनोवैज्ञानिक दबाव को भी कम करेगा।

  • असहमति और संशय: वहीं, कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि त्योहारों के दौरान ऐसे आदेश सांप्रदायिक सौहार्द और सीखने की प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं। सांता क्लॉज को केवल एक धार्मिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि ‘उपहार देने वाले’ और ‘खुशियाँ बांटने वाले’ एक वैश्विक प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे स्कूलों में उत्सव का माहौल प्रभावित हो सकता है।

4. निजी स्कूलों की दुविधा

श्रीगंगानगर के कई बड़े निजी स्कूलों में क्रिसमस पर बड़े आयोजन होते हैं। इस आदेश के बाद स्कूल प्रबंधन अब किसी भी उत्सव को मनाने से पहले अधिक सावधानी बरत रहे हैं। प्रबंधकों का कहना है कि वे हमेशा से आपसी सहमति से कार्य करते आए हैं, लेकिन सरकारी लिखित आदेश के बाद अब कागजी औपचारिकताएं बढ़ जाएंगी।


निष्कर्ष

जिला शिक्षा अधिकारी का यह आदेश केवल सांता क्लॉज बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्कूली स्वायत्तता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच एक महीन संतुलन बनाने की कोशिश है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षा का मंदिर विवादों से दूर रहे और हर बच्चा अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित महसूस करते हुए शिक्षा प्राप्त करे। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अन्य जिलों में भी इसी प्रकार के दिशा-निर्देश लागू किए जाते हैं।

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