
श्रीगंगानगर, 27 नवंबर: श्रीगंगानगर जिले की श्रीविजयनगर तहसील के गांव 16 जीबी की रहने वाली प्रमिला बिश्नोई ने पारंपरिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए खेती के क्षेत्र में एक नई और प्रेरणादायक कहानी लिखी है। प्रमिला ने अपना कीमती समय मोबाइल और सोशल मीडिया से हटाकर आधुनिक और जैविक खेती में लगाया है, जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने अपने खेत में ड्रैगन फ्रूट की हाईटेक फार्मिंग शुरू की है। यह पहल न सिर्फ आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
मोबाइल छोड़कर ‘मिट्टी’ से जोड़ा नाता
प्रमिला बिश्नोई के इस बदलाव की शुरुआत उनके पति ओमप्रकाश बिश्नोई, जो पेशे से एक अध्यापक हैं, के सहयोग से हुई। दोनों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि क्यों न अपनी सवा बीघा जमीन का इस्तेमाल किसी ऐसी फसल के लिए किया जाए जो न सिर्फ जलवायु के अनुकूल हो, बल्कि बाजार में जिसकी मांग भी अच्छी हो।
काफी शोध और विचार-विमर्श के बाद, उन्होंने ड्रैगन फ्रूट की खेती का फैसला किया। ड्रैगन फ्रूट, जिसे पिटाया भी कहा जाता है, एक विदेशी फल है लेकिन भारत में इसकी मांग और कीमत दोनों ही तेज़ी से बढ़ी हैं। यह फसल कम पानी में भी हो जाती है, जो श्रीगंगानगर जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
हाईटेक सेटअप और 5 लाख रुपये का निवेश
प्रमिला और उनके पति ने इस परियोजना को पूरी तरह से आधुनिक तरीके से शुरू किया है। उन्होंने अपनी सवा बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट के लिए विशेष पोल और जाली (Trellis) का पूरा ढांचा तैयार कराया। ड्रैगन फ्रूट की बेल को बढ़ने के लिए सहारे की ज़रूरत होती है, जिसके लिए सीमेंट के पोल लगाए गए हैं।
इस पूरे हाईटेक सेटअप को तैयार करने में प्रमिला और उनके पति ने लगभग 5 लाख रुपये का शुरुआती निवेश किया है। यह निवेश ड्रैगन फ्रूट की सफल और लंबी अवधि की खेती के लिए आवश्यक है, क्योंकि इसका ढांचा एक बार लगने के बाद कई वर्षों तक फल देता रहता है।
पूर्ण जैविक खेती पर विशेष ध्यान
प्रमिला बिश्नोई का सबसे बड़ा संकल्प इस खेती को पूरी तरह से जैविक रखना है। उन्होंने फैसला किया है कि वह अपनी फसल में किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) या कीटनाशकों (Pesticides) का इस्तेमाल नहीं करेंगी।
वह अपने पौधों के पोषण के लिए पारंपरिक और प्राकृतिक उपायों पर निर्भर हैं। उनकी खेती का आधार मुख्य रूप से निम्नलिखित जैविक खादें हैं:
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जीवामृत (Jeevamrut): यह गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और पानी को मिलाकर बनाया जाने वाला एक प्राकृतिक घोल है, जो मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को बढ़ाता है।
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घनजीवामृत (Ghanjeevamrut): यह जीवामृत का सूखा रूप है, जिसका इस्तेमाल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
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गोबर खाद (Cow Dung Manure): सड़ी हुई गोबर की खाद, जो मिट्टी के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का भंडार है।
जैविक तरीकों का उपयोग करके प्रमिला न केवल उच्च गुणवत्ता वाले और स्वास्थ्यवर्धक फल उगा रही हैं, बल्कि अपनी मिट्टी को भी रासायनिक प्रदूषण से बचा रही हैं।
उत्पादन की उम्मीदें
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को देखते हुए, प्रमिला बिश्नोई को उम्मीद है कि उनके ड्रैगन फ्रूट के पौधे अगले साल फल देना शुरू कर देंगे। दिसंबर 2025 से इस खेत से फल उत्पादन शुरू होने की संभावना है। एक बार फल आना शुरू हो जाने के बाद, यह खेत प्रमिला के लिए एक अच्छी आय का स्रोत बनेगा और जिले के अन्य किसानों को भी आधुनिक और जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।