
राजस्थान के श्रीगंगानगर में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और बाल शोषण के गंभीर मुद्दे पर समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाल जागरूकता संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी ने समाज के विभिन्न वर्गों, अभिभावकों और प्रशासनिक अधिकारियों को एक मंच पर लाकर, बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए सामूहिक जिम्मेदारी पर विचार-विमर्श किया।
🏛️ संगोष्ठी का आयोजन और उद्देश्य
यह संगोष्ठी राजस्थान बाल अधिकारिता विभाग और बाल कल्याण समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई थी। आयोजकों का मुख्य उद्देश्य बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए, समाज में जागरूकता का प्रसार करना और बच्चों के लिए एक सुरक्षित वातावरण के निर्माण पर ज़ोर देना था। इस आयोजन में शिक्षाविद्, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ, कानूनी सलाहकार और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हुए।
📱 मुख्य विषय: डिजिटल युग में बाल शोषण
संगोष्ठी का मुख्य केंद्र बिंदु बालकों पर हो रहे विभिन्न प्रकार के शोषणों पर रहा। वक्ताओं ने शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण के पारंपरिक स्वरूपों के साथ-साथ, आधुनिक डिजिटल खतरों पर विशेष चिंता व्यक्त की।
सबसे गंभीर मुद्दा मोबाइल फोन के दुरुपयोग के कारण पनप रहे अपराधों का था। विशेषज्ञों ने बताया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया तक बच्चों की आसान पहुँच उन्हें साइबर बुलिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी, और अनुचित सामग्री के संपर्क में ला सकती है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। इसके अलावा, मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग के कारण बच्चे असामाजिक होते जा रहे हैं और उनका शैक्षणिक प्रदर्शन भी प्रभावित हो रहा है।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आज के डिजिटल युग में, बच्चों के शोषण के तरीके बदल गए हैं, इसलिए माता-पिता और शिक्षकों को भी तकनीकी रूप से जागरूक होना ज़रूरी है।
📢 संगोष्ठी से निकला प्रमुख संदेश
संगोष्ठी के अंत में, सभी वक्ताओं और विशेषज्ञों ने समाज को एक शक्तिशाली और स्पष्ट संदेश दिया: बच्चों का संरक्षण केवल सरकारी या कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक सामूहिक सामाजिक दायित्व है।
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अभिभावकों के लिए ज़ोर: वक्ताओं ने अभिभावकों से बच्चों पर केवल भौतिक सुविधाएँ देने के बजाय, उन पर सक्रिय निगरानी रखने का आह्वान किया। उन्हें सलाह दी गई कि वे बच्चों के साथ खुले संवाद स्थापित करें, उनके ऑनलाइन व्यवहार पर नज़र रखें, और उन्हें मोबाइल फोन के सुरक्षित उपयोग के बारे में शिक्षित करें।
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भावनात्मक समर्थन: यह भी कहा गया कि बच्चों के भावनात्मक स्वास्थ्य और मानसिक भावनाओं को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर शोषण का शिकार होने पर बच्चे डर या शर्म के कारण चुप हो जाते हैं। समाज और परिवार को एक ऐसा विश्वास भरा माहौल बनाना चाहिए जहाँ बच्चे बिना किसी डर के अपनी समस्याएं बता सकें।
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कानूनी जागरूकता: संगोष्ठी में बाल श्रम, पॉक्सो एक्ट (POCSO Act), और किशोर न्याय अधिनियम जैसे बाल-संरक्षण कानूनों के बारे में भी जागरूकता फैलाई गई, ताकि लोग कानूनी मदद लेने के तरीकों को जान सकें।
निष्कर्ष रूप में, श्रीगंगानगर की इस संगोष्ठी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हर बच्चे का सुरक्षित, संरक्षित और खुशहाल बचपन सुनिश्चित करने के लिए सरकार, परिवार और समाज को मिलकर काम करना होगा।