
राजस्थान का श्रीगंगानगर जिला, जिसे गंग नहर के कारण “राजस्थान की खाद्य टोकरी” (Food Basket of Rajasthan) भी कहा जाता है, अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे सैकड़ों गांवों में विकास और मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते बदहाली का जीवन जी रहा है। भारत-पाक सीमा पर स्थित होने के कारण ये गांव सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां के निवासियों को बुनियादी नागरिक सेवाएं भी सुचारू रूप से नहीं मिल पा रही हैं।
मुख्य समस्याएं और चुनौतियां
सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले इन लोगों के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं, जिनके कारण उनका जीवन मुश्किल बना हुआ है:
- पेयजल की गंभीर कमी: कई गांवों की महिलाओं ने शिकायत की है कि उन्हें पीने के पानी के लिए काफी दूर तक जाना पड़ता है। कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक पेयजल आपूर्ति सुचारू नहीं रहती है, जिससे दैनिक जीवन कठिन हो जाता है।
- स्वास्थ्य और चिकित्सा का अभाव: इन गांवों में चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। आपातकालीन (Emergency) स्थिति में ग्रामीणों को इलाज के लिए दूर-दराज के कस्बों या जिला मुख्यालय पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे कई बार गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
- शिक्षा और रोजगार के संसाधन: उच्च शिक्षा के लिए स्कूलों की कमी है। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता है। इसके अलावा, इन इलाकों में रोजगार के संसाधन और अवसर भी अत्यंत सीमित हैं, जिससे स्थानीय युवाओं को पलायन करना पड़ता है। कुछ गांवों में मनरेगा (NREGA) जैसे काम भी महीनों से बंद पड़े हैं।
- बुनियादी ढाँचा (Infrastructure) और संपर्क: कई गांवों में पक्की सड़कों और नालियों का अभाव है, जिसके कारण गंदगी और कीचड़ की समस्या बनी रहती है। परिवहन व्यवस्था भी सुचारू नहीं होने से हर छोटी समस्या बड़ी नजर आती है।
- सुरक्षा और तनाव: भारत-पाक सीमा पर तनाव बढ़ने पर, इन गांवों पर सीधे इसका असर पड़ता है। सुरक्षा कारणों से कई बार तारबंदी के पार जिन किसानों की कृषि भूमि है, उन्हें खेती करने से रोक दिया जाता है, जिससे उनकी आय का नुकसान होता है।
सरकारी प्रयास और स्थानीय गुहार
केंद्र सरकार द्वारा बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम (Border Area Development Program) को बंद किए जाने के बाद, राज्य सरकार ने सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए मुख्यमंत्री थार सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसी नई योजनाएँ लागू की हैं। इसके तहत श्रीगंगानगर सहित अन्य सरहदी जिलों के 1206 गांवों के विकास की राह प्रशस्त करने का दावा किया गया है, जिसके लिए करोड़ों रुपए की राशि भी स्वीकृत की गई है।
हालांकि, स्थानीय लोगों की शिकायत है कि ये योजनाएँ अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं और धरातल पर विकास कार्यों में विलंब होता है। ग्रामीणों ने अपने जनप्रतिनिधियों और सरकार से बार-बार गुहार लगाई है कि इन अति संवेदनशील गांवों के लिए प्राथमिकता के आधार पर पेयजल, चिकित्सा, शिक्षा और सड़कों जैसी मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जाए, ताकि वे बदहाली छोड़कर सम्मानजनक जीवन जी सकें।